श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 215: धर्मव्याधका कौशिक ब्राह्मणको माता-पिताकी सेवाका उपदेश देकर अपने पूर्वजन्मकी कथा कहते हुए व्याध होनेका कारण बताना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  3.215.27 
भूमौ निपतितो ब्रह्मन्नुवाच प्रतिनादयन्।
नापराध्याम्यहं किंचित् केन पापमिदं कृतम्॥ २७॥
 
 
अनुवाद
हे ब्रह्मन्! बाण लगते ही ऋषि भूमि पर गिर पड़े और अपने आर्तनाद से वन को गुंजा दिया और बोले - 'अहा! मैंने किसी का कोई अपराध नहीं किया है। फिर यह पापकर्म किसने किया है?'॥27॥
 
O Brahman! As soon as the arrow hit him, the sage fell on the ground and echoed the forest with his wailing cry and said, 'Ah! I have not done any crime against anyone. Then who has committed this sinful act?'॥ 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)