श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 215: धर्मव्याधका कौशिक ब्राह्मणको माता-पिताकी सेवाका उपदेश देकर अपने पूर्वजन्मकी कथा कहते हुए व्याध होनेका कारण बताना  »  श्लोक 23-24h
 
 
श्लोक  3.215.23-24h 
आत्मदोषकृतैर्ब्रह्मन्नवस्थामाप्तवानिमाम्।
कश्चिद् राजा मम सखा धनुर्वेदपरायण:॥ २३॥
संसर्गाद् धनुषि श्रेष्ठस्ततोऽहमभवं द्विज।
 
 
अनुवाद
हे ब्राह्मण! मुझे अपने ही दोषों के कारण इस दुःखद स्थिति में पड़ना पड़ रहा है। पूर्वजन्म में जब मैं ब्राह्मण था, तब मेरी मित्रता एक राजा से हुई जो धनुर्वेद में पारंगत था। उनकी संगति से मैंने धनुर्वेद की शिक्षा प्राप्त की और धनुर्विद्या में भी निपुणता प्राप्त की।॥23 1/2॥
 
O Brahmin! I have to fall into this miserable condition because of my own faults. In my previous life when I was a Brahmin, I became friends with a king who was an expert in Dhanurveda. Through his company I started learning Dhanurveda and I acquired great proficiency in the art of archery.॥23 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)