श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 215: धर्मव्याधका कौशिक ब्राह्मणको माता-पिताकी सेवाका उपदेश देकर अपने पूर्वजन्मकी कथा कहते हुए व्याध होनेका कारण बताना  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  3.215.2-3 
प्रवृत्तचक्षुर्जातोऽस्मि सम्पश्य तपसो बलम्।
यदर्थमुक्तोऽसि तया गच्छ त्वं मिथिलामिति॥ २॥
पतिशुश्रूषपरया दान्तया सत्यशीलया।
मिथिलायां वसेद् व्याध: स ते धर्मान् प्रवक्ष्यति॥ ३॥
 
 
अनुवाद
हे ब्राह्मण! माता-पिता की सेवा ही मेरा तप है। इस तप का प्रभाव देखो। मुझे दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई है, जिसके कारण उस पतिव्रता स्त्री ने, जो सदैव पति की सेवा में तत्पर रहती है, जिसने अपनी इन्द्रियों को वश में कर लिया है तथा सत्य और सदाचार में तत्पर रहती है, तुम्हें यह कहकर भेजा है कि, 'तुम मिथिलापुरी जाओ। वहाँ एक शिकारी रहता है। वह तुम्हें समस्त धर्मों का उपदेश देगा।'॥ 2-3॥
 
Brahmin!' Serving my parents is my penance. See the effect of this penance. I have acquired divine sight, due to which that devoted wife, who is always engaged in serving her husband, who has controlled her senses and is ready for truth and good conduct, sent you here saying, 'You go to Mithilapuri. A hunter lives there. He will preach you all the religions.'॥ 2-3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)