श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 215: धर्मव्याधका कौशिक ब्राह्मणको माता-पिताकी सेवाका उपदेश देकर अपने पूर्वजन्मकी कथा कहते हुए व्याध होनेका कारण बताना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  3.215.10 
सर्वमेतदपार्थं ते क्षिप्रं तौ सम्प्रसादय।
श्रद्दधस्व मम ब्रह्मन्नान्यथा कर्तुमर्हसि।
गम्यतामद्य विप्रर्षे श्रेयस्ते कथयाम्यहम्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
किन्तु माता-पिता को संतुष्ट न करने के कारण तुम्हारे सारे धर्म-कर्म और व्रत व्यर्थ हो गए हैं। अतः शीघ्र जाकर उन दोनों को प्रसन्न करो। हे ब्रह्मन्! मेरे वचनों पर विश्वास रखो। इसके विपरीत कुछ मत करो। हे ब्रह्मर्षि! अपने घर जाओ और अपने माता-पिता की सेवा करो। मैं यह तुम्हारे परम कल्याण के लिए कह रहा हूँ॥10॥
 
But due to not satisfying your parents, all your religious practices and fasts have gone in vain. Therefore, go quickly and please them both. O Brahman! Have faith in my words. Do not do anything contrary to this. O Brahmarshi! Go to your home and serve your parents. I am telling you this for your ultimate welfare.॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)