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mahabharat 3.213.26-27: मनुष्य को हल्का भोजन करना चाहिए और अपने अंतःकरण को शुद्ध रखना चाहिए। रात्रि के प्रथम और अंतिम प्रहर में उसे सदैव ईश्वर के चिंतन में मन को एकाग्र करना चाहिए। जो इस प्रकार अपने हृदय में ईश्वर प्राप्ति का निरंतर अभ्यास करता है, वह अपने मन रूपी दीपक के द्वारा, जो जलते हुए दीपक के समान चमकता है, निराकार ईश्वर का साक्षात्कार करके तुरन्त मोक्ष प्राप्त कर लेता है।   |   mahabharat अध्याय 3.213: प्राणवायुकी स्थितिका वर्णन तथा परमात्म-साक्षात्कारके उपाय   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 213: प्राणवायुकी स्थितिका वर्णन तथा परमात्म-साक्षात्कारके उपाय  »  श्लोक 26-27
 
 
श्लोक  3.213.26-27 
पूर्वरात्रे परे चैव युञ्जान: सततं मन:।
लघ्वाहारो विशुद्धात्मा पश्यन्नात्मानमात्मनि॥ २६॥
प्रदीप्तेनेव दीपेन मनोदीपेन पश्यति।
दृष्ट्वाऽऽत्मानं निरात्मानं स तदा विप्रमुच्यते॥ २७॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य को हल्का भोजन करना चाहिए और अपने अंतःकरण को शुद्ध रखना चाहिए। रात्रि के प्रथम और अंतिम प्रहर में उसे सदैव ईश्वर के चिंतन में मन को एकाग्र करना चाहिए। जो इस प्रकार अपने हृदय में ईश्वर प्राप्ति का निरंतर अभ्यास करता है, वह अपने मन रूपी दीपक के द्वारा, जो जलते हुए दीपक के समान चमकता है, निराकार ईश्वर का साक्षात्कार करके तुरन्त मोक्ष प्राप्त कर लेता है।
 
A man should eat light food and keep his conscience pure. He should always concentrate his mind on the thought of God in the first and last part of the night. He who constantly practices the realization of God in his heart in this manner, immediately attains liberation by realizing the formless God through his mind's lamp which shines like a burning lamp. 26-27.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)