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श्लोक 3.212.2  |
ब्राह्मण उवाच
सत्त्वस्य रजसश्चैव तमसश्च यथातथम्।
गुणांस्तत्त्वेन मे ब्रूहि यथावदिह पृच्छत:॥ २॥ |
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| अनुवाद |
| ब्राह्मण बोला - शिकारी! मैं यहाँ उचित रीति से एक प्रश्न पूछ रहा हूँ। वह यह है कि सत्व, रज और तम का स्वरूप क्या है? इसे विस्तारपूर्वक बताओ॥2॥ |
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| The Brahmin said - Hunter! I am asking a question here in a proper manner. It is that what is the nature of Sattva, Raja and Tamas? Tell me this in detail.॥2॥ |
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