श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 212: तीनों गुणोंके स्वरूप और फलका वर्णन  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.212.2 
ब्राह्मण उवाच
सत्त्वस्य रजसश्चैव तमसश्च यथातथम्।
गुणांस्तत्त्वेन मे ब्रूहि यथावदिह पृच्छत:॥ २॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण बोला - शिकारी! मैं यहाँ उचित रीति से एक प्रश्न पूछ रहा हूँ। वह यह है कि सत्व, रज और तम का स्वरूप क्या है? इसे विस्तारपूर्वक बताओ॥2॥
 
The Brahmin said - Hunter! I am asking a question here in a proper manner. It is that what is the nature of Sattva, Raja and Tamas? Tell me this in detail.॥2॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas