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श्लोक 3.212.12  |
आर्जवे वर्तमानस्य ब्राह्मण्यमभिजायते।
गुणास्ते कीर्तिता: सर्वे किं भूय: श्रोतुमिच्छसि॥ १२॥ |
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| अनुवाद |
| जो मनुष्य 'सरलता' नामक गुण में स्थित है, वह ब्राह्मणत्व को प्राप्त करता है। हे ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने तुमसे समस्त गुणों का वर्णन किया है, अब तुम और क्या सुनना चाहते हो?॥12॥ |
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| One who is established in the virtue called 'simplicity' attains brahminhood. O Brahman! In this way I have described all the virtues to you, what else do you want to hear?॥12॥ |
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २१२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें ब्राह्मण-व्याध-संवादविषयक
दो सौ बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २१२॥ |
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