vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 3: वन पर्व
»
अध्याय 212: तीनों गुणोंके स्वरूप और फलका वर्णन
»
श्लोक 10
श्लोक
3.212.10
ततोऽस्य सर्वद्वन्द्वानि प्रशाम्यन्ति परस्परम्।
न चास्य संशयो नाम क्वचिद् भवति कश्चन॥ १०॥
अनुवाद
तत्पश्चात् राग-द्वेष आदि समस्त द्वन्द्व परस्पर शान्त हो जाते हैं और उसके हृदय में कभी कोई संशय उत्पन्न नहीं होता ॥10॥
Thereafter, all the conflicts like attachment, hatred etc. are mutually calmed down. No doubt ever arises in his heart. 10॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×