श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 21: श्रीकृष्णका शाल्वकी मायासे मोहित होकर पुन: सजग होना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  3.21.2 
तत: शतघ्नीश्च महागदाश्च
दीप्तांश्च शूलान् मुसलानसींश्च।
चिक्षेप रोषान्मयि मन्दबुद्धि:
शाल्वो महाराज जयाभिकाङ्क्षी॥ २॥
 
 
अनुवाद
महाराज! वहाँ से विजय की इच्छा रखने वाले मंदबुद्धि शाल्व ने क्रोध में आकर मुझ पर सैकड़ों बाण, बड़ी-बड़ी गदाएँ, प्रज्वलित भाले, मूसल और तलवारें फेंकीं।
 
Maharaj! From there, the dull-witted Shalva, who desired victory, in a fit of rage, hurled at me hundreds of arrows, large maces, blazing spears, pestles and swords.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)