प्रज्ञाचक्षुर्नर इह दोषं नैवानुरुध्यते॥ ५०॥
विरज्यति यथाकामं न च धर्मं विमुञ्चति।
अनुवाद
इस संसार में ज्ञानदृष्टि से संपन्न मनुष्य राग-द्वेष आदि विकारों का पालन नहीं करता। उसमें पर्याप्त वैराग्य होता है और वह कभी धर्म का त्याग नहीं करता।
In this world, a man endowed with the vision of knowledge does not follow the vices like love and hatred etc. He has sufficient detachment and he never abandons religion.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥