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mahabharat 3.207.d2h-48: द्विजश्रेष्ठ! सज्जन पुरुष सदैव विनम्र रहते हैं। अहंकारी मूर्खों द्वारा सोची गई प्रत्येक बात व्यर्थ होती है। जैसे सूर्य दिन का रूप प्रकट करता है, वैसे ही मूर्खों का विवेक उनका वास्तविक रूप प्रकट कर देता है। 48॥   |   mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक d2h-48
 
 
श्लोक  3.207.d2h-48 
(साधु: सन्नतिमानेव सर्वत्र द्विजसत्तम।)
मूढानामवलिप्तानामसारं भावितं भवेत्।
दर्शयत्यन्तरात्मा तं दिवा रूपमिवांशुमान्॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
द्विजश्रेष्ठ! सज्जन पुरुष सदैव विनम्र रहते हैं। अहंकारी मूर्खों द्वारा सोची गई प्रत्येक बात व्यर्थ होती है। जैसे सूर्य दिन का रूप प्रकट करता है, वैसे ही मूर्खों का विवेक उनका वास्तविक रूप प्रकट कर देता है। 48॥
 
Dwijshreshtha! A good man is always humble. Everything thought by arrogant foolish people is meaningless. Just as the sun reveals the form of the day, similarly the conscience of fools reveals their true form. 48॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)