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श्लोक 3.207.99  |
एतत् ते सर्वमाख्यातं यथाप्रज्ञं यथाश्रुतम्।
शिष्टाचारगुणं ब्रह्मन् पुरस्कृत्य द्विजर्षभ॥ ९९॥ |
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| अनुवाद |
| हे ब्राह्मण! मैंने शिष्टाचार के विषय में जो कुछ सुना और सीखा है, वह सब तुमसे कह दिया है ॥99॥ |
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| O Brahmin! I have told you everything that I have heard and learned about the virtues of etiquette. ॥ 99॥ |
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि ब्राह्मणव्याधसंवादे सप्ताधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २०७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें ब्राह्मणव्याधसंवादविषयक
दो सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २०७॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/२ श्लोक मिलाकर कुल १०० १/२ श्लोक हैं) |
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