श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 72
 
 
श्लोक  3.207.72 
कामलोभग्रहाकीर्णां पञ्चेन्द्रियजलां नदीम्।
नावं धृतिमयीं कृत्वा जन्मदुर्गाणि संतर॥ ७२॥
 
 
अनुवाद
यह शरीर एक नदी है। पाँचों इन्द्रियाँ इसका जल हैं। इसमें काम और लोभ भरे हुए हैं। यह नदी जन्म-मरण के दुर्गम क्षेत्र में बह रही है। तू धैर्य रूपी नाव पर बैठकर इसके दुर्गम स्थानों - जन्म-मरण के क्लेशों को पार कर जा ॥ 72॥
 
This body is a river. The five senses are the water in it. Lust and greed are filled in it. This river is flowing in the inaccessible region of birth and death. You sit on the boat of patience and cross its inaccessible places - the afflictions of birth and death. ॥ 72॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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