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mahabharat 3.207.67: वेदों का सार सत्य है, सत्य का सार इन्द्रिय-संयम है और इन्द्रिय-संयम का सार त्याग है। यह त्याग सभ्य पुरुषों के आचरण में सदैव विद्यमान रहता है। 67.   |   mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 67
 
 
श्लोक  3.207.67 
वेदस्योपनिषत् सत्यं सत्यस्योपनिषद् दम:।
दमस्योपनिषत् त्याग: शिष्टाचारेषु नित्यदा॥ ६७॥
 
 
अनुवाद
वेदों का सार सत्य है, सत्य का सार इन्द्रिय-संयम है और इन्द्रिय-संयम का सार त्याग है। यह त्याग सभ्य पुरुषों के आचरण में सदैव विद्यमान रहता है। 67.
 
The essence of Vedas is truth, the essence of truth is sense-control and the essence of sense-control is renunciation. This renunciation is always present in the conduct of civilized men. 67.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)