Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.207.66: उपर्युक्त सुसंस्कृत पुरुषों के आचरण में मन को सब प्रकार से स्थित करके मनुष्य जिस श्रेष्ठ गति को प्राप्त होता है, वह अन्य किसी प्रकार से प्राप्त नहीं हो सकती ॥ 66॥ | mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
शिष्टाचारे मन: कृत्वा प्रतिष्ठाप्य च सर्वश:।
यामयं लभते वृत्तिं सा न शक्या ह्यतोऽन्यथा॥ ६६॥
अनुवाद
उपर्युक्त सुसंस्कृत पुरुषों के आचरण में मन को सब प्रकार से स्थित करके मनुष्य जिस श्रेष्ठ गति को प्राप्त होता है, वह अन्य किसी प्रकार से प्राप्त नहीं हो सकती ॥ 66॥
The elevated state which a man attains by establishing his mind in every way possible in the conduct of cultured men mentioned above cannot be attained in any other way. ॥ 66॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥