श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 62
 
 
श्लोक  3.207.62 
व्याध उवाच
यज्ञो दानं तपो वेदा: सत्यं च द्विजसत्तम।
पञ्चैतानि पवित्राणि शिष्टाचारेषु सर्वदा॥ ६२॥
 
 
अनुवाद
व्याध ने कहा- द्विजश्रेष्ठ! यज्ञ, दान, तप, वेदों का स्वाध्याय और सत्यभाषण- ये पाँच पवित्र बातें सदाचारी पुरुषों के आचरण में देखी गई हैं॥62॥
 
The hunter said – Dwijshreshtha! Yagya, charity, penance, self-study of the Vedas and speaking the truth – these five sacred things have always been seen in the conduct of virtuous men. 62॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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