श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक  3.207.59 
अधर्मा धर्मरूपेण तृणै: कूपा इवावृता:।
तेषां दम: पवित्राणि प्रलापा धर्मसंश्रिता:।
सर्वं हि विद्यते तेषु शिष्टाचार: सुदुर्लभ:॥ ५९॥
 
 
अनुवाद
भूसे से ढके हुए कुओं के समान धर्म की आड़ में अनेक पाप किए जा रहे हैं। धर्मात्मा का वेश धारण किए हुए इन अधार्मिक लोगों में संयम, पवित्रता और धर्मचर्चा आदि सभी गुण तो हैं, परंतु शिष्टाचार (सज्जन पुरुष जैसा आचरण) उनमें अत्यंत दुर्लभ है। ॥59॥
 
Like wells covered with straw, many sins are being perpetrated under the guise of religion. These irreligious people, disguised as righteous, have all the qualities like self-control, purity and religious discussions, but etiquette (behaviour like that of a noble person) is very rare in them. ॥ 59॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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