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mahabharat 3.207.55-d3: धर्मात्मा पुरुष को चाहिए कि वह दूसरों के दोषों को देखना छोड़कर सदैव सबके कल्याण की कामना करे। जो पापी अपने दोषों की ओर से आँखें बंद कर लेता है और दूसरे महापुरुषों के दोषों को सदैव कपड़े में छेद के समान प्रकट और बढ़ाता रहता है, वह मरने के बाद नष्ट हो जाता है - उसे परलोक में कोई सुख नहीं मिलता ॥ 55॥   |   mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 55-d3
 
 
श्लोक  3.207.55-d3 
चिकीर्षेदेव कल्याणं श्रद्दधानोऽनसूयक:।
वसनस्येव छिद्राणि साधूनां विवृणोति य:॥ ५५॥
(अपश्यन्नात्मनो दोषान् स पाप: प्रेत्य नश्यति॥ )
 
 
अनुवाद
धर्मात्मा पुरुष को चाहिए कि वह दूसरों के दोषों को देखना छोड़कर सदैव सबके कल्याण की कामना करे। जो पापी अपने दोषों की ओर से आँखें बंद कर लेता है और दूसरे महापुरुषों के दोषों को सदैव कपड़े में छेद के समान प्रकट और बढ़ाता रहता है, वह मरने के बाद नष्ट हो जाता है - उसे परलोक में कोई सुख नहीं मिलता ॥ 55॥
 
A devout man should stop looking at the faults of others and always wish for the welfare of everyone. The sinner who closes his eyes to his own faults and always reveals and increases the faults of other great men like holes in a cloth, perishes after death - he does not get any happiness in the next world. ॥ 55॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)