श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  3.207.50 
अब्रुवन् कस्यचिन्निन्दामात्मपूजामवर्णयन्।
न कश्चिद् गुणसम्पन्न: प्रकाशो भुवि दृश्यते॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
किसी दूसरे की निन्दा नहीं करनी चाहिए, अपनी मान-प्रतिष्ठा की प्रशंसा नहीं करनी चाहिए; दूसरों की निन्दा और आत्म-प्रशंसा का त्याग किए बिना इस संसार में किसी भी सद्गुणी व्यक्ति का सम्मान हुआ हो, ऐसा नहीं देखा जाता ॥50॥
 
One should not criticize anyone else, should not praise one's own honor and reputation; it is not seen that any virtuous person has been respected in this world without criticizing others and giving up self-praise. 50॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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