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mahabharat 3.207.5-6: अनेक वनों, ग्रामों और नगरों को पार करते हुए वे राजा जनक द्वारा रक्षित, धर्म की मर्यादा से सुशोभित और यज्ञ-उत्सवों से सुशोभित सुन्दर मिथिला नगरी में पहुँचे॥5-6॥   |   mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 5-6
 
 
श्लोक  3.207.5-6 
अतिक्रामन्नरण्यानि ग्रामांश्च नगराणि च॥ ५॥
ततो जगाम मिथिलां जनकेन सुरक्षिताम्।
धर्मसेतुसमाकीर्णां यज्ञोत्सववतीं शुभाम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
अनेक वनों, ग्रामों और नगरों को पार करते हुए वे राजा जनक द्वारा रक्षित, धर्म की मर्यादा से सुशोभित और यज्ञ-उत्सवों से सुशोभित सुन्दर मिथिला नगरी में पहुँचे॥5-6॥
 
Crossing numerous forests, villages and cities, he reached the beautiful city of Mithila, protected by King Janaka, adorned with the decorum of religion and decorated with yagna-related festivals.॥ 5-6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)