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mahabharat 3.207.43: प्रिय वस्तु प्राप्त होने पर अति प्रसन्न न हो; इच्छा के विपरीत कुछ घटित होने पर दुःखी न हो; चिन्ता न करे; आर्थिक संकट आने पर भी भयभीत न हो; तथा किसी भी स्थिति में अपने धर्म का परित्याग न करे ॥ 43॥   |   mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  3.207.43 
प्रिये नातिभृशं हृष्येदप्रिये न च संज्वरेत्।
न मुह्येदर्थकृच्छ्रेषु न च धर्मं परित्यजेत्॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
प्रिय वस्तु प्राप्त होने पर अति प्रसन्न न हो; इच्छा के विपरीत कुछ घटित होने पर दुःखी न हो; चिन्ता न करे; आर्थिक संकट आने पर भी भयभीत न हो; तथा किसी भी स्थिति में अपने धर्म का परित्याग न करे ॥ 43॥
 
On obtaining a thing which is dear to you, do not be overjoyed; do not be sad if something happens contrary to your wishes; do not be anxious; do not be frightened even if you are overcome by financial crisis; and do not abandon your Dharma under any circumstances. ॥ 43॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)