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mahabharat 3.207.42: झूठ बोलना छोड़ दो; बिना कहे दूसरों का उपकार करो; काम, क्रोध या द्वेष के कारण भी धर्म का परित्याग मत करो ॥ 42॥   |   mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  3.207.42 
मृषा वादं परिहरेत् कुर्यात् प्रियमयाचित:।
न च कामान्न संरम्भान्न द्वेषाद् धर्ममुत्सृजेत्॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
झूठ बोलना छोड़ दो; बिना कहे दूसरों का उपकार करो; काम, क्रोध या द्वेष के कारण भी धर्म का परित्याग मत करो ॥ 42॥
 
Give up lying; do good to others without being told; never abandon Dharma even out of lust, anger or hatred. ॥ 42॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)