श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  3.207.29 
स एष जनको राजा दुर्वृत्तमपि चेत् सुतम्।
दण्डॺं दण्डे निक्षिपति तथा न ग्लाति धार्मिकम्॥ २९॥
 
 
अनुवाद
ये राजा जनक किसी भी दुष्ट को दण्डनीय मानते हैं, चाहे वह उनका अपना पुत्र ही क्यों न हो और किसी भी पुण्यात्मा को हानि नहीं पहुँचने देते ॥29॥
 
This King Janaka considers any wicked person punishable even if he is his own son and does not allow any virtuous person to be harmed. ॥ 29॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas