जनकस्येह विप्रर्षे विकर्मस्थो न विद्यते।
स्वकर्मनिरता वर्णाश्चत्वारोऽपि द्विजोत्तम॥ २८॥
अनुवाद
हे ब्रह्मर्षि! यह राजा जनक की नगरी है, यहाँ वर्ण-धर्म के विरुद्ध आचरण करने वाला कोई नहीं है। हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! यहाँ चारों वर्णों के लोग अपने-अपने कर्म करते हैं॥ 28॥
O Brahmarshi! This is the city of King Janaka, there is no one here who behaves against the Varna-Dharma. O best of the Brahmins! Here people of all the four Varnas perform their respective duties.॥ 28॥