| श्री महाभारत » पर्व 3: वन पर्व » अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन » श्लोक 25 |
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| | | | श्लोक 3.207.25  | कर्म शूद्रे कृषिर्वैश्ये संग्राम: क्षत्रिये स्मृत:।
ब्रह्मचर्यं तपो मन्त्रा: सत्यं च ब्राह्मणे सदा॥ २५॥ | | | | | | अनुवाद | | शूद्र का धर्म सेवा करना, वैश्य का धर्म खेती करना और क्षत्रिय का धर्म युद्ध करना है। ब्रह्मचर्य, तप, मंत्रजप, वेदों का अध्ययन और सत्यभाषण- ये वे धर्म हैं जिनका ब्राह्मण को सदैव पालन करना चाहिए। 25॥ | | | | The duty of a Shudra is to serve, the duty of a Vaishya is farming and the duty of a Kshatriya is to fight. Celibacy, penance, chanting mantras, studying the Vedas and speaking the truth – these are the religions that a Brahmin should always follow. 25॥ | | ✨ ai-generated | | |
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