श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  3.207.17 
मार्कण्डेय उवाच
बाढमित्येव तं विप्रो हृष्टो वचनमब्रवीत्।
अग्रतस्तु द्विजं कृत्वा स जगाम गृहं प्रति॥ १७॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेयजी कहते हैं- युधिष्ठिर! यह सुनकर ब्राह्मण बहुत प्रसन्न हुआ। उसने शिकारी से कहा- ‘बहुत अच्छा, तुम भी ऐसा ही करो।’ तब शिकारी ब्राह्मण को आगे लेकर घर की ओर चला।
 
Markandeya says- Yudhishthira! Hearing this the Brahmin was very happy. He said to the hunter- 'Very well, do the same.' Then the hunter took the Brahmin ahead and went towards home. 17.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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