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mahabharat 3.207.13: शिकारी बोला - हे प्रभु! मैं आपके चरणों में प्रणाम करता हूँ। हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! आपका स्वागत है। मैं वही शिकारी हूँ (जिसकी खोज में आप यहाँ आए हैं)। आप धन्य हों, कृपया आज्ञा करें, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?॥13॥   |   mahabharat अध्याय 3.207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 207: कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  3.207.13 
व्याध उवाच
अभिवादये त्वां भगवन् स्वागतं ते द्विजोत्तम।
अहं व्याधो हि भद्रं ते किं करोमि प्रशाधि माम्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
शिकारी बोला - हे प्रभु! मैं आपके चरणों में प्रणाम करता हूँ। हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! आपका स्वागत है। मैं वही शिकारी हूँ (जिसकी खोज में आप यहाँ आए हैं)। आप धन्य हों, कृपया आज्ञा करें, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?॥13॥
 
The hunter said - O Lord! I bow before your feet. O best of Brahmins! You are welcome. I am that hunter (in search of whom you have taken the trouble of coming here). May you be blessed, please order, what service can I render to you?॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)