vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 3: वन पर्व
»
अध्याय 206: कौशिक ब्राह्मण और पतिव्रताके उपाख्यानके अन्तर्गत ब्राह्मणोंके धर्मका वर्णन
»
श्लोक 27-28h
श्लोक
3.206.27-28h
ब्राह्मणानां परिभवाद् वातापि: सुदुरात्मवान्॥ २७॥
अगस्त्यमृषिमासाद्य जीर्ण: क्रूरो महासुर:।
अनुवाद
ब्राह्मणों का अनादर करने के कारण क्रूर स्वभाव वाला वह महान् राक्षस अत्यंत दुष्ट वातापि अगस्त्य मुनि के पेट में पच गया ॥27 1/2॥
Due to disrespect of Brahmins, the great demon with cruel nature got digested in the stomach of the extremely evil Vatapi Agastya Muni. 27 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×