Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 3.201.1-2: वैशम्पायनजी कहते हैं - भरतश्रेष्ठ महाराज जनमेजय! महाभाग मार्कण्डेय ऋषि के मुख से इन्द्रद्युम्न ऋषि के पुनः स्वर्ग प्राप्त करने की कथा सुनकर राजा युधिष्ठिर ने पापरहित, दीर्घायु एवं तपस्वी महात्मा मार्कण्डेय से इस प्रकार पूछा - 1-2॥ | mahabharat अध्याय 3.201: उत्तङ्ककी तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवान्का उन्हें वरदान देना तथा इक्ष्वाकुवंशी राजा कुवलाश्वका धुन्धुमार नाम पड़नेका कारण बताना । mahabharat पर्व 3: वन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा तु राजा राजर्षेरिन्द्रद्युम्नस्य तत् तथा।
मार्कण्डेयान्महाभागात् स्वर्गस्य प्रतिपादनम्॥ १॥
युधिष्ठिरो महाराज पप्रच्छ भरतर्षभ।
मार्कण्डेयं तपोवृद्धं दीर्घायुषमकल्मषम्॥ २॥
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - भरतश्रेष्ठ महाराज जनमेजय! महाभाग मार्कण्डेय ऋषि के मुख से इन्द्रद्युम्न ऋषि के पुनः स्वर्ग प्राप्त करने की कथा सुनकर राजा युधिष्ठिर ने पापरहित, दीर्घायु एवं तपस्वी महात्मा मार्कण्डेय से इस प्रकार पूछा - 1-2॥
Vaishampayanji says – Bharatshreshtha Maharaj Janamejaya! King Yudhishthira, after hearing the story of sage Indradyumna attaining heaven again from the mouth of Mahabhaga Markandeya sage, King Yudhishthir asked the sinless, long lived and ascetic Mahatma Markandeya in this way - 1-2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥