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श्री महाभारत
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पर्व 3: वन पर्व
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अध्याय 200: निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण,दानपात्रके लक्षण, अतिथि-सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्रीजप, चित्तशुद्धि तथा इन्द्रिय-निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन
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श्लोक 2-3h
श्लोक
3.200.2-3h
कीदृशीषु ह्यवस्थासु दत्त्वा दानं महामुने॥ २॥
इन्द्रलोकं त्वनुभवेत् पुरुषस्तद् ब्रवीहि मे।
अनुवाद
महामुनि! किन परिस्थितियों में दान देकर मनुष्य इन्द्रलोक के सुख भोगता है? कृपया मुझे यह बताइए।॥ 2 1/2॥
‘Mahamuni! Under what circumstances does a man enjoy the pleasures of Indraloka by giving alms? Kindly tell me this.’॥ 2 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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