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mahabharat 3.2.84: सिद्ध पुरुष जो कुछ भी चाहता है, वह उसे अपने तप के बल से प्राप्त कर लेता है। इसलिए तुम्हें तप का आश्रय लेकर अपनी इच्छाओं की पूर्ति करनी चाहिए। 84.   |   mahabharat अध्याय 3.2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  3.2.84 
सिद्धा हि यद् यदिच्छन्ति कुर्वते तदनुग्रहात्।
तस्मात्तप: समास्थाय कुरुष्वात्ममनोरथम्॥ ८४॥
 
 
अनुवाद
सिद्ध पुरुष जो कुछ भी चाहता है, वह उसे अपने तप के बल से प्राप्त कर लेता है। इसलिए तुम्हें तप का आश्रय लेकर अपनी इच्छाओं की पूर्ति करनी चाहिए। 84.
 
Whatever a Siddha Purush desires, he obtains it by the power of his penance. Therefore, you should fulfill your desires by resorting to penance. 84.
 
इ ति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अरण्यपर्वणि पाण्डवानां प्रव्रजने द्वितीयोऽध्याय:॥ २॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अरण्यपर्वमें पाण्डवोंका प्रव्रजन (वनगमन)-विषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ॥ २॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)