श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 82
 
 
श्लोक  3.2.82 
तथा त्वमपि कौन्तेय शममास्थाय पुष्कलम्।
तपसा सिद्धिमन्विच्छ योगसिद्धिं च भारत॥ ८२॥
 
 
अनुवाद
कुन्तीनन्दन! इसी प्रकार तुम भी अपने मन और इन्द्रियों को भली-भाँति वश में करो और तप के द्वारा योगजन्य सिद्धि और धन प्राप्त करने का प्रयत्न करो॥82॥
 
Kuntinandan! Similarly, you too should control your mind and senses well and try to achieve success and wealth generated by yoga through penance. 82॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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