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mahabharat 3.2.80: संसार को जीतने की इच्छा रखने वाले बुद्धिमान पुरुष राग-द्वेष से रहित होकर इसी प्रकार अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं। इन्हीं नियमों का पालन करके देवताओं ने भी कल्याण प्राप्त किया है ॥80॥   |   mahabharat अध्याय 3.2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 80
 
 
श्लोक  3.2.80 
एवं कर्माणि कुर्वन्ति संसारविजिगीषव:।
रागद्वेषविनिर्मुक्ता ऐश्वर्यं देवता गता:॥ ८०॥
 
 
अनुवाद
संसार को जीतने की इच्छा रखने वाले बुद्धिमान पुरुष राग-द्वेष से रहित होकर इसी प्रकार अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं। इन्हीं नियमों का पालन करके देवताओं ने भी कल्याण प्राप्त किया है ॥80॥
 
Wise men who wish to conquer the world perform their duties in this manner, free from attachment and aversion. By following these very rules, the gods have attained prosperity. ॥ 80॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)