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mahabharat 3.2.75: यज्ञ, स्वाध्याय, दान, तप, सत्य, क्षमा, मन और इन्द्रियों का संयम तथा लोभ का त्याग - ये आठ धर्म के मार्ग हैं ॥75॥   |   mahabharat अध्याय 3.2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  3.2.75 
इज्याध्ययनदानानि तप: सत्यं क्षमा दम:।
अलोभ इति मार्गोऽयं धर्मस्याष्टविध: स्मृत:॥ ७५॥
 
 
अनुवाद
यज्ञ, स्वाध्याय, दान, तप, सत्य, क्षमा, मन और इन्द्रियों का संयम तथा लोभ का त्याग - ये आठ धर्म के मार्ग हैं ॥75॥
 
Yagya, study, charity, penance, truth, forgiveness, control of mind and senses and abandonment of greed – these are the eight paths of religion. 75॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)