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mahabharat 3.2.71: इस प्रकार अज्ञान, कर्म और तृष्णा के द्वारा चक्र के समान घूमता हुआ मनुष्य संसार की नाना योनियों में गिरता है ॥71॥   |   mahabharat अध्याय 3.2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  3.2.71 
एवं पतति संसारे तासु तास्विह योनिषु।
अविद्याकर्मतृष्णाभिर्भ्राम्यमाणोऽथ चक्रवत्॥ ७१॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार अज्ञान, कर्म और तृष्णा के द्वारा चक्र के समान घूमता हुआ मनुष्य संसार की नाना योनियों में गिरता है ॥71॥
 
In this way, rotating like a wheel through ignorance, karma and craving, man falls into various species of the world. 71॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)