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mahabharat 3.2.64: शौनकजी बोले - "ओह! यह बड़े दुःख की बात है, इस संसार में विपरीत बातें देखने को मिलती हैं। जिन कर्मों से साधु पुरुष लज्जित होता है, उन्हीं से दुष्ट पुरुष सुख पाते हैं।"   |   mahabharat अध्याय 3.2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  3.2.64 
शौनक उवाच
अहो बत महत् कष्टं विपरीतमिदं जगत्।
येनापत्रपते साधुरसाधुस्तेन तुष्यति॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
शौनकजी बोले - "ओह! यह बड़े दुःख की बात है, इस संसार में विपरीत बातें देखने को मिलती हैं। जिन कर्मों से साधु पुरुष लज्जित होता है, उन्हीं से दुष्ट पुरुष सुख पाते हैं।"
 
Shaunakji said - Oh! It is very sad, in this world opposite things are seen. The deeds by which a saint is ashamed, the evil men get happiness from the same.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)