श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  3.2.57 
अग्निहोत्रमनड्वांश्च ज्ञातयोऽतिथिबान्धवा:।
पुत्रा दाराश्च भृत्याश्च निर्दहेयुरपूजिता:॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
यदि गृहस्थ अग्निहोत्र, बैल, जातिबंधुओं, अतिथियों, सम्बन्धियों, स्त्री-पुत्रों और सेवकों का आदर नहीं करता, तो वे उसे अपने क्रोध की अग्नि से जला सकते हैं ॥57॥
 
If a householder does not respect Agnihotra, bull, caste brothers, guests, relatives, wife-sons and servants, then they can burn him with the fire of their anger. 57॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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