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mahabharat 3.2.54: आसन के लिए कुशा, बैठने का स्थान, जल और चौथा मधुर भाषण, ये चार वस्तुएँ सज्जन के घर में कभी कम नहीं होतीं ॥ 54॥   |   mahabharat अध्याय 3.2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  3.2.54 
तृणानि भूमिरुदकं वाक् चतुर्थी च सूनृता।
सतामेतानि गेहेषु नोच्छिद्यन्ते कदाचन॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
आसन के लिए कुशा, बैठने का स्थान, जल और चौथा मधुर भाषण, ये चार वस्तुएँ सज्जन के घर में कभी कम नहीं होतीं ॥ 54॥
 
Grass (kusha) for seat, place to sit, water and fourthly sweet speech, these four things are never in short supply in the home of a good person. ॥ 54॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)