श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  3.2.49 
धर्मार्थं यस्य वित्तेहा वरं तस्य निरीहता।
प्रक्षालनाद्धि पंकस्य श्रेयो न स्पर्शनं नृणाम्॥ ४९॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य धर्म के लिए धन कमाना चाहता है, उसके लिए धन की इच्छा न करना ही श्रेयस्कर है। मनुष्य के लिए कीचड़ को न छूना ही श्रेयस्कर है, बजाय इसके कि कीचड़ पर लगाकर उसे धो डाले। ॥49॥
 
‘It is better for a person who wishes to earn money for the sake of performing Dharma (righteousness) not to desire wealth. It is better for humans not to touch mud than to apply it on it and wash it off. ॥ 49॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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