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mahabharat 3.2.48: अतः धन-संचय का त्याग कर देना चाहिए और धन-संचय से होने वाले दुःख को धैर्यपूर्वक सहन करना चाहिए। धन-संचय करने वाला कोई भी व्यक्ति दुःखों से मुक्त नहीं देखा जाता। अतः पुण्यात्मा पुरुष उसी धन की प्रशंसा करते हैं जो ईश्वर की इच्छा से न्यायपूर्वक प्राप्त किया गया हो॥ 48॥   |   mahabharat अध्याय 3.2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  3.2.48 
त्यजेत संचयांस्तस्मात्तज्जान् क्लेशान् सहेत च।
न हि संचयवान् कश्चिद् दृश्यते निरुपद्रव:।
अतश्च धार्मिकै: पुंभिरनीहार्थ: प्रशस्यते॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
अतः धन-संचय का त्याग कर देना चाहिए और धन-संचय से होने वाले दुःख को धैर्यपूर्वक सहन करना चाहिए। धन-संचय करने वाला कोई भी व्यक्ति दुःखों से मुक्त नहीं देखा जाता। अतः पुण्यात्मा पुरुष उसी धन की प्रशंसा करते हैं जो ईश्वर की इच्छा से न्यायपूर्वक प्राप्त किया गया हो॥ 48॥
 
‘Therefore one should renounce the accumulation of wealth and bear with patience the pain that comes with the renunciation of wealth. No person who has accumulated wealth is seen to be free from troubles. Therefore, virtuous men praise only that wealth which is acquired by God's will in a just and just manner.॥ 48॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)