Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 3.2.37: यद्यपि यह तृष्णा मनुष्य शरीर में रहती है, तथापि इसका न आदि है, न अन्त। लोहे की पिंडी की अग्नि के समान यह तृष्णा जीवों को नष्ट कर देती है। 37॥   |   mahabharat अध्याय 3.2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  3.2.37 
अनाद्यन्ता तु सा तृष्णा अन्तर्देहगता नृणाम्।
विनाशयति भूतानि अयोनिज इवानल:॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि यह तृष्णा मनुष्य शरीर में रहती है, तथापि इसका न आदि है, न अन्त। लोहे की पिंडी की अग्नि के समान यह तृष्णा जीवों को नष्ट कर देती है। 37॥
 
'Though this craving resides within the human body, yet it has no beginning or end. Like the fire of an iron ingot, this thirst destroys living beings. 37॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)