Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 3.2.30: जैसे खोखले में जलती हुई आग जड़ सहित पूरे वृक्ष को जला देती है, वैसे ही सांसारिक सुखों में थोड़ी सी भी आसक्ति धर्म और अर्थ दोनों को नष्ट कर देती है।॥30॥   |   mahabharat अध्याय 3.2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  3.2.30 
कोटराग्निर्यथाशेषं समूलं पादपं दहेत्।
धर्मार्थौ तु तथाल्पोऽपि रागदोषो विनाशयेत्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
जैसे खोखले में जलती हुई आग जड़ सहित पूरे वृक्ष को जला देती है, वैसे ही सांसारिक सुखों में थोड़ी सी भी आसक्ति धर्म और अर्थ दोनों को नष्ट कर देती है।॥30॥
 
Just as a fire burning in a hollow burns down the entire tree including its roots, so even the slightest attachment to worldly pleasures destroys both Dharma (righteousness) and Artha (wealth).॥ 30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)