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mahabharat 3.2.23: इन चार कारणों का समय पर उत्तर देना और उनका कभी चिंतन न करना, ये दो क्रियायोग हैं। ये ही व्याधियों और रोगों का नाश करने के उपाय हैं।॥23॥   |   mahabharat अध्याय 3.2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  3.2.23 
तदा तत्प्रतिकाराच्च सततं चाविचिन्तनात्।
आधिव्याधिप्रशमनं क्रियायोगद्वयेन तु॥ २३॥
 
 
अनुवाद
इन चार कारणों का समय पर उत्तर देना और उनका कभी चिंतन न करना, ये दो क्रियायोग हैं। ये ही व्याधियों और रोगों का नाश करने के उपाय हैं।॥23॥
 
‘Responding to these four causes in time and never thinking about them are the two Kriya Yoga (ways to end suffering). These are the ways to end ailments and diseases.॥ 23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)