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mahabharat 3.2.2-3: तब कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने उनसे कहा, "हे ब्राह्मणो! हमारा राज्य, धन आदि सब कुछ जुए में हार गया है। हम लोग फल, मूल और अन्न खाकर जीवन निर्वाह करने का निश्चय करके दुःखी होकर वन जा रहे हैं। वन में अनेक दोष हैं। वहाँ साँप, बिच्छू आदि असंख्य भयानक जीव-जन्तु रहते हैं।"   |   mahabharat अध्याय 3.2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 2-3
 
 
श्लोक  3.2.2-3 
तानुवाच ततो राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर:।
वयं हि हृतसर्वस्वा हृतराज्या हृतश्रिय:॥ २॥
फलमूलाशनाहारा वनं गच्छाम दु:खिता:।
वनं च दोषबहुलं बहुव्यालसरीसृपम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
तब कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने उनसे कहा, "हे ब्राह्मणो! हमारा राज्य, धन आदि सब कुछ जुए में हार गया है। हम लोग फल, मूल और अन्न खाकर जीवन निर्वाह करने का निश्चय करके दुःखी होकर वन जा रहे हैं। वन में अनेक दोष हैं। वहाँ साँप, बिच्छू आदि असंख्य भयानक जीव-जन्तु रहते हैं।"
 
Then King Yudhishthira, son of Kunti, said to them, "O Brahmins! Our kingdom, wealth and everything have been taken away in gambling. We are going to the forest sadly, having decided to live on fruits, roots and grains. There are many defects in the forest. There are innumerable dreadful creatures like snakes, scorpions etc.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)