श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 2: धनके दोष, अतिथिसत्कारकी महत्ता तथा कल्याणके उपायोंके विषयमें धर्मराज युधिष्ठिरसे ब्राह्मणों तथा शौनकजीकी बातचीत  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  3.2.12 
युधिष्ठिर उवाच
एवमेतन्न संदेहो रमेऽहं सततं द्विजै:।
न्यूनभावात् तु पश्यामि प्रत्यादेशमिवात्मन:॥ १२॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले, "हे महात्माओं! आप लोग ठीक कह रहे हैं। इसमें संदेह नहीं कि मैं ब्राह्मणों की संगति में सदैव सुख अनुभव करता हूँ, किन्तु इस समय धन आदि का अभाव होने के कारण मैं देख रहा हूँ कि यह मेरे लिए अपमान की बात है॥ 12॥
 
Yudhishthira said, "O Mahatmas! What you are saying is correct. There is no doubt that I always feel happy in the company of Brahmins, but at this time, due to lack of wealth etc., I see that this is a matter of disgrace for me.॥ 12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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