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श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 192: इक्ष्वाकुवंशी परीक्षित् का मण्डूकराजकी कन्यासे विवाह, शल और दलके चरित्र तथा वामदेव मुनिकी महत्ता  »  श्लोक 72
 
 
श्लोक  3.192.72 
मार्कण्डेय उवाच
श्रुत्वा वच: स मुनी राजपुत्र्या-
स्तथास्त्विति प्राह कुरुप्रवीर।
तत: स राजा मुदितो बभूव
वाम्यौ चास्मै प्रददौ सम्प्रणम्य॥ ७२॥
 
 
अनुवाद
मार्कण्डेय कहते हैं: हे कुरुवंश के प्रधान वीर युधिष्ठिर! राजकुमार की कन्या की बात सुनकर वामदेव ऋषि ने कहा, "ऐसा ही होगा।" तब राजागण अत्यन्त प्रसन्न हुए और ऋषि को प्रणाम करके उन्होंने वे दोनों वाम्य घोड़े उन्हें लौटा दिए।
 
Mārkaṇḍeya says: O valiant Yudhishthir, the head of the Kuru clan! On hearing the words of the prince's daughter, the sage Vaamadev said, "It will be so." Then the king's group became very happy, and after bowing to the sage, they returned the two Vaamya horses to him. 72.
 
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि मण्डूकोपाख्याने द्विनवत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १९२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें मण्डूकोपाख्यानविषयक

एक सौ बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १९२॥
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)