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mahabharat 3.192.71: राजकुमारी बोली, "हे प्रभु! मैं चाहती हूँ कि आज मेरे पति सभी पापों से मुक्त हो जाएँ। कृपया मुझे यह वर दीजिए कि वे अपने पुत्रों और बन्धु-बान्धवों के साथ सुखपूर्वक रहें। हे ब्राह्मण! मैंने आपसे यह वर माँगा है।"   |   mahabharat अध्याय 3.192: इक्ष्वाकुवंशी परीक्षित् का मण्डूकराजकी कन्यासे विवाह, शल और दलके चरित्र तथा वामदेव मुनिकी महत्ता   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 192: इक्ष्वाकुवंशी परीक्षित् का मण्डूकराजकी कन्यासे विवाह, शल और दलके चरित्र तथा वामदेव मुनिकी महत्ता  »  श्लोक 71
 
 
श्लोक  3.192.71 
राजपुत्र्युवाच
वरं वृणे भगवंस्त्वेवमेष
विमुच्यतां किल्बिषादद्य भर्ता।
शिवेन चाध्याहि सपुत्रबान्धवं
वरो वृतो ह्येष मया द्विजाग्रॺ॥ ७१॥
 
 
अनुवाद
राजकुमारी बोली, "हे प्रभु! मैं चाहती हूँ कि आज मेरे पति सभी पापों से मुक्त हो जाएँ। कृपया मुझे यह वर दीजिए कि वे अपने पुत्रों और बन्धु-बान्धवों के साथ सुखपूर्वक रहें। हे ब्राह्मण! मैंने आपसे यह वर माँगा है।"
 
The princess said, "O Lord! I wish that my husband be freed from all his sins today. Please give me this blessing that he lives happily with his sons and relatives. O Brahmin! I have asked for this boon from you. 71.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)