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mahabharat 3.192.44: उधर वामदेव ऋषि मन में इस प्रकार चिंता करने लगे - 'अहा! वह युवा राजकुमार मेरे उत्तम घोड़ों के साथ रमण कर रहा है, उन्हें लौटाने का विचार भी नहीं करता। यह बड़ी चिंता की बात है!'॥ 44॥   |   mahabharat अध्याय 3.192: इक्ष्वाकुवंशी परीक्षित् का मण्डूकराजकी कन्यासे विवाह, शल और दलके चरित्र तथा वामदेव मुनिकी महत्ता   ।   mahabharat पर्व 3: वन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 3: वन पर्व  »  अध्याय 192: इक्ष्वाकुवंशी परीक्षित् का मण्डूकराजकी कन्यासे विवाह, शल और दलके चरित्र तथा वामदेव मुनिकी महत्ता  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  3.192.44 
अथर्षिश्चिन्तयामास तरुणो राजपुत्र: कल्याणं पत्रमासाद्य रमते न प्रतिनिर्यातयत्यहो कष्टमिति॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
उधर वामदेव ऋषि मन में इस प्रकार चिंता करने लगे - 'अहा! वह युवा राजकुमार मेरे उत्तम घोड़ों के साथ रमण कर रहा है, उन्हें लौटाने का विचार भी नहीं करता। यह बड़ी चिंता की बात है!'॥ 44॥
 
On the other hand, sage Vaamdev started worrying in his mind like this - 'Oh! That young prince is having fun with my good horses, he does not even think of returning them. This is a matter of great concern!'॥ 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)