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श्लोक 3.190.97  |
संक्षेपको हि सर्वस्य युगस्य परिवर्तक:।
स सर्वत्र गतान् क्षुद्रान् ब्राह्मणै: परिवारित:।
उत्सादयिष्यति तदा सर्वम्लेच्छगणान् द्विज:॥ ९७॥ |
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| अनुवाद |
| वे सम्पूर्ण कलियुग का नाश करके नये सत्ययुग का प्रवर्तन करेंगे। वे ब्राह्मणों से घिरे हुए सर्वत्र विचरण करेंगे और संसार में फैले हुए नीच स्वभाव वाले समस्त म्लेच्छों का नाश करेंगे॥ 97॥ |
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| He will destroy the entire Kali Yuga and will usher in the new Satya Yuga. He will roam everywhere surrounded by Brahmins and will destroy all the mlechha with low nature spread all over the world.॥ 97॥ |
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि भविष्यकथने नवत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १९०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें भविष्यवर्णनविषयक
एक सौ नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १९०॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल ९७ १/२ श्लोक हैं) |
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