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श्लोक 3.190.62-63  |
दस्युभि: पीडिता राजन् काका इव द्विजोत्तमा:।
कुराजभिश्च सततं करभारप्रपीडिता:॥ ६२॥
धैर्यं त्यक्त्वा महीपाल दारुणे युगसंक्षये।
विकर्माणि करिष्यन्ति शूद्राणां परिचारका:॥ ६३॥ |
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| अनुवाद |
| राजन! श्रेष्ठ ब्राह्मण भी लुटेरों से त्रस्त होकर कौओं की तरह रंभाते फिरेंगे। दुष्ट राजाओं द्वारा लगाए गए करों के बोझ से सदैव व्याकुल होकर वे धैर्य खो देंगे और शूद्रों की सेवा तथा धर्म विरुद्ध कर्म करने लगेंगे। हे राजन! घोर कलियुग के अंत में संसार की यही दशा होगी। 62-63। |
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| King! Even the best Brahmins will roam around croaking like crows, troubled by robbers. Being always troubled by the burden of taxes imposed by evil kings, they will lose patience and will engage in serving the Shudras and do things against Dharma. O King! This will be the condition of the world at the end of the terrible Kali Yuga. 62-63. |
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